आज के इस वेब सीरीज वाले दौर में क्या एक हम ब्लैक एंड वाइट फिल्म देखने का जोखिम उठा सकते, हम खर्चा करके भले ही रेस-३ या सिम्भा देख लेंगे लेकिन ब्लैक एंड वाइट फ़िल्म… नॉट पॉसिबल!!! राइट ?


नमस्ते दोस्तों,

साल 1957 ने हिंदी सिनेमा को कुल चार बेहतरीन हिन्दी फिल्मे दी थी.

पहली थी नरगिस-सुनील दत्त स्टारर “मदर-इंडिया”, दूसरी दिलीप कुमार की “नया दौर” और तीसरी गुरुदत्त साहब की क्लासिक कृति ‘प्यासा”, बड़ी स्टारकास्ट वाली इन तीनो फिल्मो का नाम और चर्चे खूब हुए लेकिन इन तीनो से अलग एक चौथी फिल्म और भी थी जिसका नाम शायद कम ही लोगो ने सुना होगा, वह बेहतरीन फिल्म थी “दो आंखे बारह हाथ”, गाना “ऐ मालिक तेरे बन्दे हम” तो आपको जरुर याद होगा, यह गाना इसी फिल्म से है।

जीनियस वी. शांताराम के डायरेक्शन में बनी “दो आंखे बारह हाथ” ने अपने ज़माने में ढेरो अवार्ड जीते, आखिर क्या ख़ास था इस अजीब नाम वाली फिल्म में चलिए जानने की कोशिश करते है.

Do Aankhen Barah Haath (1957)

ब्लैक एंड वाइट फिल्म “दो आंखे बारह हाथ” सच्ची कहानी है एक यंग लेकिन सनकी जेलर (वी. शांताराम) और उसकी जेल के छह खूनी और खूंखार कैदियों की.

Do Aankhen Barah Haath

फिल्म की शुरुआत होती हैं जेलर आदिनाथ के उस पुरानी जेल में नए जेलर बनकर आने के साथ जहाँ सिर्फ खतरनाक खुनी कैदियों को ही रखा जाता था,अपने सीनियर जेलर से बिलकुल अलग आदिनाथ का मनाना था के अगर इन खूंखार कैदियों के साथ ठीक से इंसानो की तरह बर्ताव किया जाये तो उन्हें भी इंसान बनाया जा सकता है.

कहीं आप ये तो नही सोच रहे की इस तरह का सब्जेक्ट किसी पुरानी बोरिंग ब्लैक एंड वाइट फिल्म का ही हो सकता हैं आजकल इस टाइप की बाते कौन करता है, लेकिन इससे पहले की आप किसी कन्क्लूज़न पर पहुंचे आप को एक बार इस फिल्म को जरूर देखना चाहिए क्योकि फिल्म के शुरू होने के कुछ ही देर बाद हो सकता हैं आपको उस सनकी जेलर की बाते अजीब लगना बंद हो जाए।

prisoners

खैर, अपने जॉब के पहले ही दिन जेलर आदिनाथ अपने ऑफिस में बैठकर कुछ काम कर रहा है कमरे में कुछ अंधेरा है तभी एक हट्टा कट्टा कैदी सफाई करने के बहाने उसके ऑफिस में घुस आता है,खूंखार कैदी के चेहरे पर उसके खतरनाक इरादे साफ दिख रहे है लेकिन उससे बेखबर जेलर आदिनाथ पूरी तरह अपने काम में लगा है वह किसी पेपर पर कुछ लिख रहा  है तभी मौका पाकर कैदी जेलर तेज चाकू से हमला कर देता है लेकिन इससे पहले की चाकू जेलर की गर्दन तक पहुँच पाता आदिनाथ अपनी मजबूत कलाईयों की पकड़ से एक ही झटके में उस खूंखार कैदी को किसी चूहे की तरह दबोच लेता है, ये सब आवाजे सुन ऑफिस में कई और पुलिस वाले आ जाते है लेकिन आदिनाथ सब को चुप चाप वापस भेज देता है जैसे की कुछ हुआ ही नहीं, यह सब देख कैदी हक्का बक्का वही खड़ा रह जाता है.

सबके जाने के बाद आदिनाथ कैदी से पूछता है की वह उसे आखिर क्यों मरना चाहता है वह तो उसे जनता ही नहीं,तब कैदी बताता है की कई सालो से वह अपने बच्चो से मिला नहीं है कई बार बोलने पर भी कोई उसकी बात नहीं सुनाता है इसलिए वह नए जेलर का खून करके इस सिस्टम से अपना बदला निकलना चाहता है, ये सब सुन आदिनाथ थोड़ा मुस्कुरा देता है और वह कैदी को वही कागज पकडाता है जिस पर वह थोड़ी देर पहले साइन कर रहा था, असल में वह कागज उसी कैदी को उसके बच्चो से मिलने की मजूरी देता था,उस कागज को देख वह हट्टा कट्टा खूंखार कैदी भी आदिनाथ के पैरो में गिरकर किसी बच्चे की तरह रोने लगता है, इस शुरुआती सीन के ख़त्म होते होते चाह कर भी इस फिल्म को छोड़ना मुश्किल हो जाता है, हो सकता हैं आप ये भी भूल जाओ की आप कोई ब्लैक एंड वाइट फिल्म देख रहे हो 🙂

फिल्म की कहानी आगे बढ़ती है और अगले ही दिन नया जेलर अपने सीनियर जेलर से यहाँ रिक्वेस्ट करता है की वह एक सोशल एपेरिमेंट करना चाहता है जिसके लिए वह जेल के छह सबसे खतरनाक कैदियों को अपने साथ कुछ दिनों के लिए बाहर ले जाकर किसी ऐसी खुली जेल में रखना चाहता है जहाँ कोई बंद जेल के कमरे नही होगे और जहाँ यह खूंखार कैदी मेहनत करके इक ईमानदारी की जिंदगी बसर कर सकेगे.

यह सब सुन बड़ा जेलर पहले तो उसकी बात को हंसी में उड़ा कर मना कर देता हैं लेकिन कई बार जिद करने के बाद वह बड़ा जेलर इस शर्त पर मनाता है की अगर एक कैदी भी भागा तो इसकी जिम्मेदारी उसी की होगी और फिर वह सबके सामने अपनी हार स्वीकार कर लेंगा।

आदिनाथ अपनी जान की परवाह किये बगैर अपने साथ जाने के लिए उस जेल के सबसे खतरनाक छह कैदियों को चुनता है, उन कैदियों को लेकर एक सुनसान खँडहर में लेकर जाता है जहाँ दूर दूर तक सब बंजर है. इस जगह को वो लोग आजाद-नगर का नाम देते है.

आगे क्या होता है क्या जेलर अपने आईडिया में सक्सेसफुल है या फिर जैसा की सभी सोचते है की इन सब बातो में कुछ नहीं रखा.. इसके लिए आपको इस फिल्म को देखना पढ़ेगा 🙂

यह फिल्म हमें ये महसूस करने का मौका देती है की इस फिल्म की तरह ही हमारे जीवन में भी ऐसे कई मोड़ आते हैं जहाँ हमें  लगने लगता है की सब कुछ ख़त्म हो गया लेकिन फिर सिर्फ एक दृड़ विश्वास से हम हर विपरीत परिस्थियों को बदलकर अपनी अपनी जीत सुनिश्चत कर सकते हैं.

टाइम मिले तो फिल्म जरुर देखे.

थैंक्स.