“पैरासाइट” एक ब्लैक कॉमेडी फिल्म है, ब्लैक कॉमेडी का मतलब होता है समाज में मौजूद टेबुस या उन गंभीर मुद्दों ( जिन पर कोई बात करना नहीं चाहता ) को बड़े ही हलके-फुल्के अंदाज में पेश करना, समाज में मौजूद इन्ही मुद्दों में से एक सामाजिक असमानता (social inequality) से पर्दा उठाती है यह कोरियाई मास्टर-पीस फिल्म.


नमस्ते दोस्तों,

पैरासाइट (Parasite) फिल्म की कहानी शुरू होती है “कीम” परिवार से, चार लोगो का यह गरीब परिवार किसी मकान के बेसमेंट में रहता हैं, पैसो के आभाव में बस जैसे तैसे गुजर बसर कर रहे इस परिवार के यहाँ खाने तक के लाले पड़े है.

Kims

फिर एक दिन अचानक किस्मत पाकर उस गरीब कीम परिवार के लड़के की नौकरी उसी शहर के एक अमीर “पार्क परिवार” के यहाँ टिउशन पढ़ाने के लिए लग जाती है, धीरे धीरे लड़का अपनी चालाकी से अमीर परिवार के बाकि पुराने नौकरों की हमेशा के लिए छुट्टी करवा कर उन सब की जगह अपने परिवार को फिट करवा देता है जैसे की बहन को आर्ट टीचर,पिता को ड्राईवर और माँ को घर की केयर टेकर की नौकरी पर.. फिल्म के इस भाग को इतने बढ़िया तरीके से दिखाया गया हैं की आप तुरंत फिल्म से कनेक्ट हो जाते हो.

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शुरुआती संघर्ष के बाद अब गरीब कीम परिवार की जीविका अब पूरी तरह से अमीर “पार्क परिवार” पर निर्भर हो जाती है दुसरे शब्दों के गरीब कीम परिवार अब एक परजीवी (पैरासाइट) बनकर आराम की ज़िंदगी बसर करने लगता हैं.

फिर अचानक, कहानी में ट्वीस्ट उस तेज बारिश वाली रात आता है जब अमीर “पार्क परिवार” अपने परजीवियों (गरीब कीम परिवार) को घर में अकेला छोड़ पिकनिक मनाने बाहर गया होता है और ठीक तभी घर की पुरानी केयर-टेकर अपना सामान लेने के बहाने घर आ धमकती है, जहा वो ये भांप जाती है की किस तरह गरीब कीम परिवार चालाकी से उसकी नौकरी छुडवा कर खुद वहां ऐश की जिंदगी जी रहा है और फिर वह उन्हें ब्लैकमेल करना शुरू कर देती है और यह कहती है की उसका पति जिसे उसने कई सालो मकान के बेसमेंट में छिपा कर रखा था उसे वहीँ बेसमेंट में रहने दें नही तो वह उनका राज खोल देगी।

पैरासाइट की यहाँ तक की कहानी तो एक आम फिल्म की कहानी की तरह आती है जो आगे की फिल्म का मेटाफॉर सेट करती है, लेकिन फिल्म की असली कहानी तो इसके बाद ही शुरू होती है… कहानी आगे बढ़ती है और शुरू होता है एक खुनी संघर्ष, अपने अपने परिवार को बचाने का, कहानी के आखिर में आते आते ढेरो मानवीय रहस्यों से भी पर्दा उठता है जो इस फिल्म को अद्भुत बनाते है.

एक आखरी सवाल जो आपके मन में रह जाता है की असली पैरासाइट(परजीवी) कौन है गरीब कीम परिवार या फिर अमीर वाला “पार्क परिवार ?

इस फिल्म में यह दिखाने की कोशिश की गयी है की ये पैरासाइट वाली कहानी सिर्फ इन दो परिवारों की कहानी नहीं हैं बल्कि यह कहानी तो हम सब की है, इस सिस्टम की है जिसमे हम सब रहते है और ऐसा ही सब कुछ तो हम रोजाना अपने आस पास देखते ही हैं.

फिल्म देखते देखते शायद आपको कार्ल-मार्क्स और उनकी वही वर्ग-संघर्ष(class struggle ) और पूंजीवाद(capitalism) वाली बाते दोबारा याद आ जाये जो शायद आज भी अपनी प्रासंगिकता याद दिलाती है.

फिल्म के शुरुआती सीन तो कमाल के गुदगुदाने वाले है ही उसके अलावा भी कई-कई सीन फ़िल्म खत्म होने के बाद भी आपको याद रहा जाते है, जैसे एक सीन जिसमे भारी बारिश के बाद जहाँ शहर के गरीब लोग अपने घरो से बाहर फुटपाथ पर सोने को मजबूर है वहीं महँगी कार में बैठी अमीर “पार्क परिवार” की मालकिन अपने गरीब ड्राईवर के सामने इस बारिश के बाद अपने लॉन में उगने वाली ताज़ी घांस पर शाम की पार्टी की प्लानिंग करती नजर आती है.

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अंत आते आते फिल्म और भी अधिक गंभीर हो जाती है और अंततः फिल्म की एंडिंग गरीब परिवार के लड़के के उस सपने से होती है जिसमे वह एक दिन बड़ा आदमी बनकर उसी घर को खरीदता है जिसमे उसका पूरा परिवार नौकर था, वास्तविकता में भी शायद अधिकांश गरीबो की ख्वाइशो का अंत उनके सपने में ही हो जाता है.

समय मिले तो इस फिल्म को जरुर देखिये, एक बार में समझ नहीं आये तो दोबारा देखीये 🙂

थैंक्स.